लड़का हूँ तो क्या!

1)
कभी चोट लगे तो माँ चिल्लाता हूँ,
अंदर ही अंदर तड़पता हूँ,
फिर भी चुप रह जाता हूँ,

लड़का हूँ तो क्या हुआ,
मैं भी घबराता हूँ।

2)
छोटी उम्र से ही दिखा 
देती है दुनिया हमे,अपने रंग,
कही नौकरी के लिए भटकता हूँ
दर दर की ठोकरे खाता हूँ

लड़का हूँ तो क्या मैं भी घबराता हूँ।

3)
दबा हुन बोझ तले,
रिस्ते है सब, 
पर अंदर से बेसहारा हु,
मैं भी बेचारा हु,
लड़का हुन तो क्या मैं भी घबराता हुन।


4)
चाहते है मेरी भी सब जैसी,
मेरी भी कुछ ख़्वाहेसिएन हैं,
मुझे  भी इश्क़ होता है,
पर अब न रही मेरी फार्माइसे,

5)
जिससे चाहता हुन, उसे 
सीधे मुह कह आता है,
डर लगता है कही बर्बाद न हो जाऊं,
मैं भी इंसान हुन, मैं भी घबराता हुन,

6)
टूट जाता हूँ,
रूठ जाता हुन, 
सब गम सह ,कही चुप बैठ जाता हूँ,
लड़का हुन तो क्या ,,मैं भी घबराता हुन!
दर दर की ठोकरे खाता हुन।
मैं भी घबराता हुन
।

The end.

दर दर ठोकरे खाता हुन,
पर घर मैं कभी कुछ न बताता हुन,
कुछ करना है ज़िन्दगी मैं,
पर नौममीडियोद के बोझ तले दबा हु,

लड़का हुन तो क्या ,मैं भी घबराता हुन

10th december 2109
7: 11 pm

Comments

Popular posts from this blog

EMOTIONS ( a poem) __ by_shiva rajak.

तुम्हारे ख्वाब है कहीं ( एक कविता)_कवी -shiva rajak.

घर से दूर ! कविता - शिवा रजक