घर से दूर ! कविता - शिवा रजक

घर से दूर ! - शिवा रजक (23 मई 2025)


अक्सर थक कर घर आता हूँ,

सूने घर में अकेला खुद को पाता हूँ।

सारे रोज़मर्रा के काम खत्म करके,
थक कर खाने को रोटियाँ बनाता हूँ।

पसीने से भीगे सिर, हाथ और बदन में,
थक कर मैं नहाने जाता हूँ।
ये दिन भर की थकान और ये घर, ये मकान,
ये रोज़मर्रा की ज़रूरतें और
मेरी ये अलग पहचान।
सब करते करते मैं सच में बहुत थक जाता हूँ।
मैं मेरी बनाई दुनिया में हर रोज़ खो जाता हूँ।

अब रात की शुरुआत होती है,
अंधेरे में दीवारों से बहुत सारी बात होती है।
इस सन्नाटे में, मैं खुद को तलाशता रह जाता हूँ,
और फिर तुम्हारी याद आती है और मैं
खामोश हो जाता हूँ।

फिर यूँ ही उलट-पलट कर बिस्तर पर टटोलता हूँ,
तुम्हें अपने बगल में ढूंढता हूँ,
ये तुम्हारी कमी और मेरी ज़िंदगी,
ये गहरा घाव मेरे मन को निचोड़ते जाते हैं।
मैं आंखें बंद करता हूँ कि बस तुम्हारा ख्याल आता है।
इन ख्यालों में खोए हुए मैं
बहुत खामोश हो जाता हूँ।
खामोशियों से बातें करता हूँ और
यादों की परछाइयों में गुम हो जाता हूँ।

हर बीतता दिन ये दर्द और ज़्यादा दिखाता है,
अंधेरों में खुद को अकेला पाकर
मेरी चीखों को बाहर ले आता है।
मैं रोकर, हँसकर, बिलखता हूँ।
और तुम्हारा नाम चिल्लाकर हँसता हूँ,
कि तुम मेरे पास क्यों नहीं आ जाती हो?
मुझे अपने हाथ से क्यों नहीं खिलाती हो?
ये मेरा तुम्हारा दूर रहना फालतू है क्या?
ये दूरियाँ, ये दर्द जरूरी है क्या?
ये खामोशियाँ, ये सन्नाटा बहुत चुभते हैं।
तेरे मेरे किस्से बहुत हैं,
सबको याद करते करते बस जीते जाता हूँ।
मैं हर रोज़, रोज़मर्रा की ज़िंदगी जी के मर जाता हूँ।
मैं अक्सर थक कर घर आता हूँ।
मैं अक्सर थक कर घर आता हूँ।

ये घर से दूर रहना,
माँ-पापा और घरवालों की तन्हाई सहना,
सुबह से रात तक खटना और चंद पैसे कमाना, और उन पैसों से घर-बार चलाना –
मामूली है क्या?
ये अफसाना हर घर से निकले हुए औरत-मर्द की कहानी है, और ये बात मुझे तुम सबको बतानी है।

यूँ तन्हा-तन्हा अपने अफसानों में,
मैं खुद रोते-बिलखते, फिसलते-सो जाता हूँ।
मैं अक्सर थक कर घर आता हूँ।
ये कहानी बड़ी तन्हा होकर मुझे सताती है।
ये चंद पैसों की कमी मेरी आज़ादी खा जाती है।
घर से इतने दूर रहते हैं कि
त्योहार में घर भी नहीं जा पाते हैं।
ये अफसाना दर्द का – हम खुद को
तसल्ली देते रह जाते हैं,
कि अगली बार छुट्टियों में माँ से मिल आऊंगा,
एक साड़ी, एक चप्पल और पापा के लिए जूते ले जाऊँगा।
उनके हाथों से बना खाना खाऊँगा,
और फिर माँ की गोद में रोते-रोते सो जाऊँगा।

माँ, तेरी याद बहुत आती है,
और तेरा ना होना मुझे बहुत सताता है।
यहाँ कोई अपना नहीं है माँ,
जो मुझे 'बेटा-बेटा' कहकर बुलाता है।
माँ-पापा की कमी बहुत महसूस होती है,
जैसे –
पापा की चप्पल पहन के बड़ा आज़ाद महसूस करता था माँ,
अब ये सूट-बूट मुझे बहुत चुभते हैं।
वो कपड़े, वो एलबेस्टर का घर
माँ, मुझे बहुत याद आता है।
वो साथ मिलकर बैठकर खाना – मुझे बहुत याद आता है।

जो जीवन से भागते आया,
नौकरी की तलाश में सबको छोड़ आया,
ये नौकरी मुझे खा जाती है माँ।
माँ, तेरी याद बहुत सताती है माँ।
माँ, अक्सर थक कर घर आता हूँ...
तुम सबको याद करके रोज़ रोते-बिलखते सो
जाता हूँ।

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