किनारा हूँ ! 💜 " कविता ( शिवा रजक )


किनारा हूँ ।

क्षितिज है दूर दूर तक ,
धुंधला धुंधला मैं किनारा हूँ ,

अजीब सी महफ़िल है , 
सबके साथ , मैं भी हारा हूँ ।

साथ साथ दरिया में 
हाथ पकड़ के मैं कहाँ जा रहा हूँ।

बूंद बून्द पानी लेके
मैं नदियाँ भरना चाह रहा हूँ ।

अकेला हूँ किनारा हूँ ।



शिवा रजक 
30 :04 :2022











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