काश । एक कविता by शिवा रजक

काश 

काश के एक समंदर होता 
छोटी सी नाव होती 
और समंदर के बीच मे मेरा घर होता ।

दूर होता , अकेला होता 
माहौल से अच्छा सुकून में होता ।

न नफरत होती वहां , 
बस आसमान होता
सितारे होते , सामने देखने को
एक सितारों का जहाँ होता ।

काश मैं एक समंदर में होता ,
समंदर नहर सा होता , होता
वो बगल में घर के , रास्तो डगर में होता ,
वो समंदर सुकून होता ,

वो काश होता , और काश ,काश ही ज़िन्दगी होती ।

लेखक 
शिवा रजक 
6 oct/ 2021

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