मैं ये समझ नही पा रहा हूँ!
(Pre scriptum: - Exclamation mark in most of the sentences means either the
line ends there Or the poet is trying to explain the deepness of the
respective statement !).
The poem >
मैं ये समझ नही पा रहा हूँ!
मैं ये समझ नही पा रहा हूँ !
आखिर मैं क्या चाह रहा हूँ
किस दिशा किस मोड़ से
किस रास्ते मैं कहाँ जा रहा हूँ!
कौन सी राहें चलनी है ,
किस मुकाम पे जा पहोचाना है ,
क्या हासिल करना और
किश हद्द तक जेबे भरनी है ,
क्या है सही और क्या गलत ,
क्या ये मेरे वास्तव का सच है ,
या कोई अत्तित की परछाई है ।
या ये कर्मा है जो घूम के वापस आ रहा है!
बस यही सब है जो
मैं समझ नही पा रहा हूँ ,
की किस दिशा,
कौन से मोड़ से कहाँ
मैं कहाँ जा रहा हूँ।
ये कौन से रंगमंच मे हूँ मैं!
ये कैसे किरदार को मैं निभा रहा हूँ,
जहाँ मैं ही नायक हूँ,
और मैं ही खुद को मारना चाह रहा हूँ !
मैं ये समझ नही पा रहा हूँ!
की किस दिशा मैं कहाँ जा रहा हूँ।
पढ़ाई लिखाई एक तरफ
एक तरफ
माँ, बाप , भाई और बहन
की जिम्मेदारियाँ रखूं,
एक तरफ खुद की जरूरतें!
एक तरफ समाज की कार्रवाइयाँ रखूं,
मैं किस हाथो से तौलूँ सबको ,
किन हाथो में अपनी अच्छाइयाँ रखूं!
नहीं जनाब नही ,
मैं उतना उलझा नही
जितना समझ रहे है आप,
मैं सुलझा ही हूँ
बस कभी कभी ज़िंदगी
एक पल में दिख जाती है ,
बस यही सब है
जो आपको इन् कुछ पंक्तियों
मैं बतलाना चाह रहा हूँ!
मैं भी एक आम इंसान हूँ
जो भीड़ से भागता
और ऐसा करते करते
इस भीड़ में ही मिलता जा रहा हूँ!
मैं हूँ , सब है ,
सब कुछ चल तो रहा है
और सब कुछ ऐसा ही
चलता जाएगा !!
ये आम ज़िन्दगी है
जिसके आगे मैं
नही देख पा रहा हूँ !
मैं यही समझ नही पा रहा हूँ,
के किस दिशा, किस रास्ते ,
मैं कहाँ जा रहा हूँ!
लेखक-
शिवा रजक 💓
दिनांक :-
18 दिसंबर 2020
9:58 संध्या !
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